Thursday, October 30, 2014

FUN-MAZA-MASTI बदलाव के बीज--47

 FUN-MAZA-MASTI
 बदलाव के बीज--47

अब आगे...

 इसलिए मैंने एक-एक कर उनसे सवाल पूछना शुरू किये;

मैं: अच्छा मैं आपसे कुछ बात करना चाहता था|

भौजी: हांजी बोलिए, कल रात से मैं भी बेचैन हूँ की आखिर आपको कौन सी बात करनी है?

मैं: कल शाम जब हम सिनेमा से लौटे थे और माधुरी आपको दिखी तो आप उस पे बरस पड़ीं| राशन-पानी लेके चढ़ गईं... मुझे इस बात का बुरा नहीं लगा पर लगा की आप मुझ पे हक़ जाता रहे हो और मुझे अच्छा लगा पर कभी-कभी आप ये भूल जाते हो की हमारे रिश्ते की कुछ सीमाएं हैं जो दुनिया वालों के लिए बंधी गईं हैं और आप गुस्से में उन्हें (सीमाओं को) भी लांघ जाते हो| नतीजन आपके आस-पास हैरान हो जाते हैं और ख़ास कर नेहा वो बेचारी तो सहम गई थी इतना सहम गई की मेरे पीछे छुप गई|

भौजी: जब भी मैं उसे देखती हूँ तो मेरे तन-बदन में आग लग जाती है| पता नहीां क्यों पर वो मुझे अपनी "सौत" लगती है!

मैं: क्या?

भौजी: हाँ ... उसे देख के मेरा खून खौल उठता है| और जब वो आप पे हक़ जताने की कोशिश करती है तो मन करता है उसका खून कर दूँ! आपको नहीं पता क्या-क्या गुल खिलाये हैं इस लड़की ने!

मैं: बताओ तो सही क्या गुल खिलाये इसने?

भौजी: आपको याद है नहा के हेड मास्टर साहब ने बताया था की उनकी हाल ही में बदली हुई है|

मैं: हाँ

भौजी: उनका लड़का शहर में पड़ता था और यहाँ अपने पिताजी के पास आया था मिलने| अब ये लड़की उसके पीछे भी पद गई... उसे अपनी मीठी-मीठी बातों से बरगला लिया और दोनों की इतनी हिम्मत बढ़ गई की दोनों घर से भाग निकले! और ये भी कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं है, यही कोई साल भर पहले की बात होगी| अब ना जाने उस लड़के ने इसके साथ क्या-क्या किया होगा, कोई तीन दिन बाद हेडमास्टर साहब दोनों को पकड़ के गाँव वापस लाये... और माधुरी के बाप ने सारी आत हेडमास्टर साहब के लड़के पर डाल दी, की वही उनकी लड़की को भगा ले गया| बेचारे इतना बदनाम हुए की गाँव छोड़के चले गए!

मैं: वैसे आप को इतनी विस्तार में जानकारी किसने दी?

भौजी: छोटी ने (रसिका भाभी)| उसके पेट में कोई बात नहीं पचती... उसका चेहरा देख के मैं सब समझ जाती हूँ|

मैं कहना तो चाहता था की माधुरी नीचे से बिलकुल कोरी थी ! और उसका उद्घाटन मैंने ही किया था पर फिर मैं चुप रहा वरना उनका मूड ख़राब हो जाता|

भौजी: पता नहीं उसे क्या हुआ जो इस तरह आपके पीछे पड़ गई और आपको इतना परेशान किया और आपका नाजायज फायदा उठाया| इसीलिए उसे देखते ही मुझे बहुत गुस्सा आता है और मैं ये भी भूल जाती हूँ की मैं कहाँ हूँ और किस्से बात कर रही हूँ| आसान शब्दों में कहूँ तो मैं आपको लेके बहुत POSSESSIVE हूँ!


 मैं: अच्छा आज आप क्योंकि बहुत कुछ बताने के मूड में हो तो मैं एक और बात आपसे जानना चाहता हूँ|

भौजी: पूछिये

मैं: मैंने देखा है की घर में कोई भी रसिका भाभी पर ध्यान नहीं देता| वो देर तक सोती रहती हैं ... काम में हाथ नहीं बटाती... सुस्त हैं... और तो और उनका लड़का वरुण, उसे तो ननिहाल भेजे इतना समय हो गया| मैं जब आया था उसके अगले दिन वो ननिहाल चला गया था और उसी दिन गट्टू भी लुधियाना चला गया?

भौजी: गट्टू लुधियाना में पढता है ... ऐसा घरवाले सोचते हैं| असल में वो वहां एक फैक्ट्री में काम करता है|

मैं: तो उसेन ये बात घर में क्यों नहीं बताई?

भौजी: दरअसल आपको पढता देख बड़के दादा की इच्छा हुई की गट्टू भी पढ़े और आप की तरह बने पर उसके दिमाग में पढ़ाई घुसती ही नहीं|

मैं: आपको ये बात कैसे पता?

भौजी: ये बात आपके चन्दर भैया और अजय भैया को पता है और बड़के दादा के डर से कोई उन्हें नहीं बताता|

मैं: और ये रसिका भाभी का क्या पंगा है?

भौजी: दरअसल शादी के पाँच महीने में ही उसे लड़का हो गया था!

मैं: क्या? पर ये कैसे हो सकता है? क्या अजय भैया और रसिका भाभी पहले से एक साथ थे... मेरा मतलब क्या उनकी लव मैरिज थी?

भौजी: नहीं Arrange मैरिज थी... आपकी रसिका भाभी का शादी के पहले किसी के साथ चक्कर था! उनके परिवारवाले ये बात जानते थे इसलिए उन्होंने जल्दीबाजी में ये शादी कर दी| जब ये पेट से हुई तो ये बात खुली.. बड़ा हंगामा हुआ| पर क्योंकि लड़का हुआ था तो बात को धीरे-धीरे दबा दिया| पर आपके बड़के दादा ने वरुण को कभी अपना पोता नहीं माना| उसे बिचारे बच्चे को यहाँ उतना प्यार सिर्फ आप से ही मिला, उसकी अपनी माँ उसे दुत्कार देती थी| दूध तक नहीं पिलाती थी, तब मैं उसे बोतल का दूध पिलाया करती थी| अजय को तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता और वो बार-बार उससे (रसियक भाभी से) लड़ता रहता है| अब चूँकि आप शहर से आय थे और इन बातों से अनजान थे इसलिए वरुण को ननिहाल भेज दिया ताकि आपको इस बात की जरा भी भनक ना लगे|

अब मेरी समझ में सारी बात आ गई| चूँकि बड़के दादा चन्दर भैया से ज्यादा प्यार करते हैं इसलिए उनसे एक पोते की उम्मीद रखते हैं| पर मैंने उन्हें कभी नेहा के साथ वो प्यार देते नहीं देखा जो वो अपने पोते को देना चाहते थे, जो की गलत बात थी|

भौजी: अब आप एक बात बताओ, आप क्यों बड़के दादा और बड़की अम्मा से लड़ पड़े?

मैं: मैंने कोई लड़ाई नहीं की, मैंने बस वो कहा जो मेरी अंतर-आत्मा ने मुझसे कहा| हाँ मैं मानता हूँ की मेरा बात करने का लहजा सही नहीं था और उसके लिए मैं उनसे माफ़ी मांग लूंगा पर मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा|

पता ही नहीं चला की हमें बातें करते-करते शाम हो गई| घडी देखि तो पाँच बज रहे थे|



 मैं बहार आया तो देखा अम्मा और दादा कुऐं के पास चारपाई डाले बैठे थे और उन्हीं के पास बिछी चारपाई पर माँ और पिताजी बैठे थे| मैं चुप-चाप सर झुकाये उनके पास आया और हाथ बंधे खड़ा हो गया| पीछे-पीछे भौजी भी घूँघट काढ़े खड़ी हो गईं|

मैं: दादा.. अम्मा ... मैंने जिस लहजे में आप दोनों से सुबह बात की उसके लिए मैं आपसे माफ़ी मांगना चाहता हूँ| मुझे इस लहजे में आपसे बात नही करनी चाहिए थी|

बड़के दादा: आओ मुन्ना बैठो यहाँ| देखो तुम शहर में रहे हो .. पढ़े लिखे हो ... वो भी अंग्रेजी में.... तुम्हारी सोच नए जमाने की है.... और हम ठहरे बुजुर्ग और पुरानी सोच वाले| तुम्हारी और हमारी सोच में जमीन आसमान का अंतर है| जो हमारे लिए सही है वो तुम्हारे लिए गलत पर खेर तुम्हारे पिताजी ने हमें बताया ई तुम अपने बर्ताव के लिए क्षमा मांगना चाहते हो पर जो तुमने कहा उसके लिए नहीं| ठीक है... तुम भी अपनी जगह सही हो और हम भी| तो इसमें अब कोई गिला-शिकवा नहीं बचा|

जवाब बहुत रुखा था और सब कुछ जानने के बाद मैं सीधे जवाब की उम्मीद भी नहीं कर रहा था| खेर मैं उठा और छप्पर के नीचे तख़्त पे बैठ गया| भौजी भी मेरी बगल में बैठ गईं, इतने मैं वहां नेहा आ गई और मेरे पास आके बोली;

नेहा: पापा मेरा छोटे भाई-बहन कहाँ है?

मैं और भौजी उसकी बात सुनके ठहाका मार के हँस पड़े| हमारी हँसी सुन रसिका भाभी रसोई से निकली और हँसी का कारन पूछने लगी| जब उन्हें पता चला तो वो भी हँसी पर वो हँसी बनावटी लग रही थी|

 मैं बहार आया तो देखा अम्मा और दादा कुऐं के पास चारपाई डाले बैठे थे और उन्हीं के पास बिछी चारपाई पर माँ और पिताजी बैठे थे| मैं चुप-चाप सर झुकाये उनके पास आया और हाथ बंधे खड़ा हो गया| पीछे-पीछे भौजी भी घूँघट काढ़े खड़ी हो गईं|

मैं: दादा.. अम्मा ... मैंने जिस लहजे में आप दोनों से सुबह बात की उसके लिए मैं आपसे माफ़ी मांगना चाहता हूँ| मुझे इस लहजे में आपसे बात नही करनी चाहिए थी|

बड़के दादा: आओ मुन्ना बैठो यहाँ| देखो तुम शहर में रहे हो .. पढ़े लिखे हो ... वो भी अंग्रेजी में.... तुम्हारी सोच नए जमाने की है.... और हम ठहरे बुजुर्ग और पुरानी सोच वाले| तुम्हारी और हमारी सोच में जमीन आसमान का अंतर है| जो हमारे लिए सही है वो तुम्हारे लिए गलत पर खेर तुम्हारे पिताजी ने हमें बताया ई तुम अपने बर्ताव के लिए क्षमा मांगना चाहते हो पर जो तुमने कहा उसके लिए नहीं| ठीक है... तुम भी अपनी जगह सही हो और हम भी| तो इसमें अब कोई गिला-शिकवा नहीं बचा|

जवाब बहुत रुखा था और सब कुछ जानने के बाद मैं सीधे जवाब की उम्मीद भी नहीं कर रहा था| खेर मैं उठा और छप्पर के नीचे तख़्त पे बैठ गया| भौजी भी मेरी बगल में बैठ गईं, इतने मैं वहां नेहा आ गई और मेरे पास आके बोली;

नेहा: पापा मेरा छोटे भाई-बहन कहाँ है?

मैं और भौजी उसकी बात सुनके ठहाका मार के हँस पड़े| हमारी हँसी सुन रसिका भाभी रसोई से निकली और हँसी का कारन पूछने लगी| जब उन्हें पता चला तो वो भी हँसी पर वो हँसी बनावटी लग रही थी|


बस तभी नेहा आ गई और हम अलग हो गए| वो रात बस ऐसी ही हँसी-मजाक करते हुए बीती और अगली सुबह एक नई समस्या को साथ ले आई| सुबह चाय पीने के बाद अम्मा ने मुझसे कहा की मैं उनके साथ चक्की तक चलूँ क्योंकि वहाँ से आटा लाना है| अब घर में कोई पुरुष नहीं था तो मैं उनके साथ ख़ुशी-ख़ुशी चल दिया| रास्ते में कल को हुआ उसके बारे में हमारी बात चल राय थी| अम्मा मेरी बातों से प्रभावित थीं पर संतुष्ट नहीं, क्योंकि उनके विचार अब भी बड़के दादा के जैसे थे| मैंने भी इस बात को ज्यादा तूल नहीं दी और बात बदल दी| जब महम वापस घर पहुँचे तो वहाँ मुझे एक लड़का जो लगभग मेरी उम्र का था वो भौजी से बात करता हुआ दिखा| मैं उसे नहीं जानता था, मैं आटा रसोई में रख के वापस आया तो नेहा उछलती हुई मेरे पास आई| उसने अब भी स्कूल ड्रेस पहना हुआ था, यानी वो अभी-अभी स्कूल से आई थी| मैंने नेहा को गोद में ले लिया और भौजी की ओर देखा तो वो अपने घर में घुस गईं| अब मुझे समझ नहीं आया की ये बाँदा है कौन और इसने भौजी से ऐसा क्या कह दिया की वो अंदर चलीं गई| इतने में वो लड़का चन्दर भैया की ओर चल दिया जो कुऐं की मुंडेर पे बैठे थे| वो हाथ जोड़ के उनसे कुछ कहने लगा और तभी चन्दर भैया ने मेरी ओर इशारा करते हुए ऊँची आवाज में कहा; "भैया जो कहना है हमारे मानु भैया से कहो| वो सिर्फ इन्हीं की बात मानती हैं|" अब ये टोंट था या सच इसमें फर्क करना बहुत मुश्किल था| पर मैं फिर भी चुप रहा और वो लड़का मेरे पास अाया और बोला; "भाई साहब प्लीज जीजी को समझाइये की वो मेरे साथ चरण काका की बेटी की शादी में चलें|" अब उसके मुंह से "जीजी" शब्द सुनके ये साफ़ था की वो मेरा "साला" ही होगा| मैंने उससे कहा; आप यहीं रुको और नेहा को समभालो मैं बात करता हूँ"| पर नेहा थी की अपने मामा की गोद में जा ही नहीं रही थी| वो गोद से उत्तर गई और भागती हुई मेरे पिताजी के पास चली गई| खेर मैं भौजी को समझाने के मूड से घर में घुसा तो अंदर भौजी चारपाई पे बैठी थीं और उनका सर झुका हुआ था|

मेरे कुछ बोलने से पहले ही उन्होंने अपनी बात सामने रख दी;

भौजी: अगर आप मुझे शादी अटेंड करने के लिए कहने आय हो तो मैं आपको छोड़के कहीं नहीं जा रही!!!

अब जवाब तो साफ़ था इसलिए मैं चुप-चाप दिवार का सहारा लेके खड़ा रहा| घर में एक दम सन्नाटा था! कुछ देर होने के बाद भौजी कु मुंह से बोल फूटे;

भौजी: I’m Sorry!

मैं: It’s okay. उस दिन रात को आपने बताया था की चरण काका की वजह से "ससुरजी" ने आपको दसवीं तक पढ़ने के लिए शहर भेजा और आज उनकी लड़की की शायद है और आपको स्पेशल बुलावा आया है और आप जाने से मना कर रहे हो?

भौजी: मैं आपके बिना नहीं रह सकती|

मैं: यार आप कौनसा हमेशा के लिए जा रहे हो? कल शादी है, परसों विदाई तरसों आप आजाना| सिर्फ तीन दिन की ही तो बात है|

भौजी: नहीं... आप मुझे छोड़के चले जाओगे?

मैं: नहीं जाऊँगा

भौजी: नहीं मैं आपके बिना एक दिन भी नहीं रह सकती!

मैं: अच्छा मेरे लिए चले जाओ ! प्लीज !!! and I Promise मैं कहीं नहीं जाऊँगा| और इसी बहाने आप "ससुरजी" को खुशखबरी दे देना की वो नाना बनने वाले हैं!!!
भौजी: ठीक है पर अगर मेरे आने पर आप मुझे यहाँ नहीं मिले तो आप मेरा मारा मुंह देखोगे!

मैं: उसकी नौबत ही नहीं आएगी| चलो अब ख़ुशी-ख़ुशी अपना सामान पैक करो मैं "साले साहब" को बुलाता हूँ|

मैंने बहार जाके अनिल (साले साहब) को आवाज दी और उसे अंदर आने को कहा| अंदर आके उसने भौजी को सामान पैक करते देखा तो खुश हो गया| इतने में कूदती हुई नेहा भी आ गई और मेरी गोद में बैठ गई;

मैं: बेटा तैयार हो जाओ आप नानू के घर जा रहे हो!

नेहा खुश हो गई और भौजी उसे कमरे में ले जाकर तैयार करने लगीं| तैयार होक नेहा मेरी गोद में फिर चढ़ गई और अब भी मामा के पास नहीं जा रही थी|

भौजी: अनिल तुमने "इनको" थैंक्स बोला?

अनिल: ओह सॉरी जीजी, थैंक यू भाई साहब!

भौजी: भाई साहब? ये तेरे भाई साहब थोड़े ही हैं.... (अब मैंने भोएं सिकोड़ के भौजी को देखा और उन्हें आगे बोलने से रोकने लगा, पर वो कहाँ सुनने वाली थीं तू अजय को क्या कहके बुलाता है?

अनिल: जीजा जी

भौजी: तो ये तेरे अजय भैया के भाई ही तो हैं, इस नाते ये तेरे क्या हुए?

अनिल: जीजा जी... ओह! थैंक यू जीजा जी|

अनिल के मुंह से जीजा जी सुन के मुझे कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा पर भौजी के मुख पे जो संतोष था वो देख मैं मन ही मन हँस पड़ा| ऐसा लगा जैसे उन्हें ये छोटी-छोटी खुशियां बहुत सुख देती हैं| शायद वो मन ही मन अपनी जीत पे बहुत अकड़ रही होंगी की उन्होंने आखिर अपने भाई से "जीजा जी" बुलवा ही लिया| मैं भी मुस्कुरा दिया!


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